प्रस्ताव बनाकर कहा कि जिलाधिकारी के नीचे किसी से नहीं करेंगे बात
पांच साल बाद मेजा ऊर्जा निगम सलैया कला व सलैया खुर्द पर अब काम कराना चाहता है जिसका किसान विरोध कर रहे हैं। इसी तरह मेजा ऊर्जा निगम को दी गई सात गाँवों की 685 हेक्टेयर ज़मीन के मुआवज़े व नौकरी देने के मामले को लेकर प्रभावित सभी किसान मज़दूर बिजली उत्पादन कम्पनी का बहिष्कार कर रहे हैं। किसानों ने कहा कि उनके साथ धोखा हुआ है इसलिए वह शुरू से ही सरकार, प्रशासन व कम्पनी का विरोध कर रहे हैं। उनकी मांग है कि भूमि अधिग्रहण की कानूनी प्रक्रिया की पारदर्शिता उजागर हो। इलाहाबाद जनपद में मेजा तहसील के कोहड़ार में स्थापित की जाने वाली विद्युत उत्पादन ईकाई मेजा ऊर्जा निगम संयुक्त उपक्रम एनटीपीसी के लिए ली गई ज़मीन के मामले में भूमि अधिग्रहण कानून को ताक पर रखा गया। अधिग्रहण की कानूनी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता नहीं बरती गई। किसानों से उनकी ज़मीन जबरन छीनी जा रही है। मुआवजा तय करते समय उनसे राय नहीं ली गई। मुआवजा राशि सर्किल रेट से भी कम दर पर दी गई। नौकरी देने का वायदा तत्कालीन जिलाधिकारी व एनटीपीसी प्रबंधन ने किया था किंतु उसे भी पूरा नहीं किया गया।उक्त बातें शुक्रवार को सलैया कला गांव में हुई एक जनसभा के दौरान विस्थापन विरोधी मंच के संयोजक राजीव चन्देल ने कही। दो दिन पूर्व अपनी भूमि पर निर्माण कार्य रोक देने से कंपनी व किसानों में काफी झड़प हुई थी। बाद में कंपनी के उच्च अधिकारियों ने किसानों को वार्ता के लिए बुलाया, लेकिन किसानों ने कहा कि कंपनी के अधिकारियों से कोई बात नहीं की जाएगी। उनकी लड़ाई सीधे प्रशासन व सरकार से है।
श्री चन्देल ने कहा कि सलैया कला व सलैया खुर्द के किसानों, ग्राम समाज व भूदान समिति की ज़मीन को जबरन मेजा ऊर्जा निगम को स्थानान्तरित कर दिया गया है, जबकि किसान इससे सहमत नहीं हैं। इनमें कई ने आज तब मुआवजा नहीं लिया और न ही अब तक करार पत्रावलियों पर दस्तखत किए हैं। इन गाँवों की कुल करीब 300 हेक्टेयर ज़मीन पर आज तक एनटीपीसी का कब्ज़ा नहीं है। इससे साबित होता है कि उक्त ज़मीन एनटीपीसी के उपयोग की नहीं है। इसे कम्पनी जबरन लेना चाहती है। अब यह ज़मीन नए भूमि अधिग्रहण कानून के मुताबिक ही ली जा सकती है क्योंकि नया कानून कहता है कि यदि अधिग्रहित ज़मीन को पांच साल तक अधिग्रहित करने वाली संस्था द्वारा उपयोग में नहीं लाया गया तो उस ज़मीन को नए अधिग्रहण कानून के तहत अधिग्रहण की प्रक्रिया दोबारा पूरी करनी होगी।

मंच के अध्यक्ष राजकुमार यादव ने कहा कि लगभग 100 गृह विस्थापितों का नाम दर्ज नहीं किया गया और न ही उन्हें किसी प्रकार का मुआवजा दिया गया। अतः प्रभावित सभी विस्थापितों को नाम दर्जकर उन्हें कालोनी तथा जीवनयापन के लिए रोज़गार दिया जाए। अधिग्रहित भूमि पर गुजर-बसर करने वाले करीब पांच हजार मज़दूर परिवारों के पुनर्वास व रोज़गार का प्रबंध किया जाए। प्रभावित किसानों-मज़दूरों के जलस्रोतों जैसे कुएं, तालाब व नाले का उचित मुआवजा दिया जाए। इनमें प्रति कुएँ का मुआवजा पांच लाख से आठ लाख के बीच बनाएं। बेलन प्रखण्ड नहर की जलना राजबहा को तत्काल एनटीपीसी के कब्जे से हटाए जाने तथा नहर के दक्षिण तरफ से ही अधिग्रहण करने की बात को दुहराया गया। वृक्षों का मुआवजा उचित दर पर तथा अधिग्रहित की गई ग्राम समाज की सैकड़ों बीघे ज़मीन की मुआवजा राशि ग्राम समाज के खाते में दी जाए जिससे उसका उपयोग गाँवों के विकास में किया जा सके। कम्पनी अपना निर्माण कार्य भू-गर्भ जल से करा रही है जबकि यह कानूनन अपराध है। अतः कम्पनी के एमडी के खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज कराई जाए। कम्पनी द्वारा बिजली उत्पादन से होने वाले प्रदूषण की गंभीरता के बारे में बताया जाए। किसान टोंस नदी से कम्पनी को एक बूंद भी पानी नहीं लेने देंगे। बंजर और पहाड़ी ज़मीन की परिभाषा बताई जाए।
